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Tuesday, May 17, 2022

कितना सुंदर होता है, UPSC में फेल हो जाना !

एक कोरा (Quora) यूजर हैं, अकंद सितरा।
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UPSC दिए, क्लियर नहीं हुआ। फिर से दिए, फिर नहीं हुआ. लेकिन रोए नहीं कतई. कोरा पर एक सवाल आया. कि IAS अफसर बनने का सफ़र कितना खुशनुमा होता है? उसका जवाब दिया अकंद ने. लेकिन IAS बनने नहीं, न बनने के बारे में. ये एक खुला ख़त है, उन सभी के लिए जो UPSC के लिए पूरी मेहनत करते हैं. बार-बार ट्राय कर भी फेल हो जाते हैं. बल्कि सिर्फ उनके लिए ही नहीं, उन सभी के लिए जो किसी न किसी एग्जाम में फेल हुए हैं.
अकंद ने ये पोस्ट कोरा पर अंग्रेजी में लिखी थी.
मुझे अपना छोटा सा इतिहास देने की इजाजत दें.
सिविल सर्विसेज 2013- इंटरव्यू फेल
सिविल सर्विसेज 2015- मेन्स फेल
सिविल सर्विसेज 2015- प्रीलिम्स फेल
RBI मैनेजर पोस्ट 2015- इंटरव्यू फेल
SSC CGL 2015- टायर 2 फेल
हर साल, मैं किसी न किसी एग्जाम के फाइनल राउंड तक पहुंचता हूं और फिर बाहर हो जाता हूं. फाइनल लिस्ट में हमेशा कुछ नंबरों से रह गया, हर बार.
इतना करीब. फिर भी इतना दूर.
तीन साल की पढ़ाई. क्या मैंने अपना समय बर्बाद किया? कैसा रहा ये सफ़र? क्या मैं खुश हूं? मेरी एक सिंपल सी जिंदगी में ऐसे बहुत से सवाल हैं.
ख़ुशी असल में होती क्या है? अलग-अलग समय पर इसकी परिभाषाएं बदलती रहती हैं.
हर साल, 10 लाख लोग सिविल सर्विस एग्जाम के लिए अप्लाई करते हैं. उनमें से कितने लोग असल में खुश हैं?
हर साल 5 लाख से ज्यादा लोग प्रीलिम्स नहीं दे पाते हैं. या तो वो भूल जाते हैं. या काम और परिवार की वजह से एग्जाम देने नहीं जा पाते हैं. उन्होंने अप्लाई किया है, तो क्वालीफाई करने की चाहत तो होगी ही न. और ये बात कि वो एग्जाम दे ही नहीं पाए हैं, उन्हें उदास तो करती ही होगी.
4 लाख 85 हजार से ज्यादा लोग प्रीलिम्स क्लियर नहीं कर पाते. कुछ पढ़कर पेपर देते हैं. कुछ टाइम पास के लिए. लेकिन न सेलेक्ट होने पर खुश तो नहीं ही होते हैं न.
जो 15 हजार लोग प्री क्लियर कर मेन्स का एग्जाम देते हैं, उसमें से 12 हजार बाहर हो जाते हैं. 5 दिन लगाकर 9 कठिन पेपर देते हैं, साल भर मेहनत से पढ़ाई करने के बाद. मेन्स न क्लियर कर पाने के बाद वो तो बहुत दुखी होते हैं.
जो 3 हजार इंटरव्यू देते हैं, उनमें से 2 हजार शॉर्टलिस्ट नहीं होते. वो बिखर जाते हैं. कुछ नंबरों से रह जाते हैं. और उनका करियर एक साल रिवर्स हो जाता है.
आखिरी हजार लोगों में से 900 खुश नहीं होते. क्योंकि अपने मन की पोस्ट नहीं मिलती. ITS, IIS, IRTS में मेरे कई दोस्त हैं, जिनका मोहभंग हो चुका है. क्योंकि वो जिन पोस्ट्स पर हैं, उनका चार्म नहीं है. चार्म तो बस IAS, IPS और IFS का है. बाकी सब तो नॉर्मल सरकारी नौकरी होती हैं. तो, क्या वो खुश हैं? अगर उन्हें एक नंबर और मिल जाता, वो IAS बन सकते थे. ये बात उनकी आत्मा को कांटे की तरह चुभती रहेगी, हमेशा. इतना पास, फिर भी इतना दूर.
टॉप 100 में से, आखिरी के 30 लोग नाखुश होते हैं. क्योंकि उनको अपनी चॉइस के कैडर नहीं मिलते. जिसे मुंबई चाहिए, उसे नागालैंड मिल जाता है. ऐसी जगह भेज दिया जाता है जहां की बोली, भाषा, कल्चर, कुछ भी उन्हें समझ नहीं आता. अगर एक नंबर ज्यादा आया होता तो वो अपने स्टेट में होते. या अपने शहर में. सिर्फ एक नंबर. इतना पास, फिर भी इतना दूर.
तो 10 लाख लोगों में 9 हजार, 99 लाख, 950 लोग नाखुश हैं. अलग, अलग कारणों से.
क्या हमें हमारी मानसिक स्थिति उन चीजों के हिसाब से तय करनी चाहिए, जो हमारे वश में नहीं हैं?
क्या हमारी ख़ुशी मात्र किसी एग्जाम में पास होने पर निर्भर रहती है?
क्या हमें उन चीजों के बारे में दुखी होना चाहिए, जो बदल नहीं सकतीं?
मैं नहीं जानता. ये आप तय करें.
मैं बताता हूं, मुझे कैसा लगता है.
बिना किसी इनकम के, मम्मी-पापा के पैसों पर एक उदास कमरे में रहते हुए, खुद को 3 साल घिसने के बावजूद कुछ भी न कर पाने के बाद भी मुझे संतोष है.
हां, मुझे खुद से संतोष है. क्योंकि इस सफ़र में मैं बहुत बदल गया हूं. मेरे अनुभवों ने मुझे बदल दिया है, मेरी बेहतरी के लिए.
2013 में जब मैं कॉलेज में था, एक बेवकूफ, इम्मैच्योर लड़का था. क्लास का जोकर था. मुझसे लोग चिढ़ जाते थे और कभी सीरियसली नहीं लेते थे. पूरे कॉलेज में ,मेरा मजाक उड़ता था.
और उसके बाद, मैंने एग्जाम की तैयारी शुरू की.
सिविल सर्विस के लिए मुझे बहुत कुछ पढ़ना पड़ा: देश-दुनिया की हिस्ट्री, जॉग्रफी, पॉलिटी, इकोनॉमिक्स, एनवायरनमेंट, एथिक्स, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, सोशियोलॉजी, करेंट अफेयर्स, साइंस और इस आसमान के नीचे की हर चीज.
इन तीन सालों में, आप कह सकते हैं, मैंने इन सभी सब्जेक्ट्स में MA कर लिया था. 10 अलग-अलग सब्जेक्ट्स में MA.
SSC के लिए मैंने मैथ्स, इंग्लिश, रीजनिंग और लॉजिक पढ़ा. वो भी हाई लेवल का. 3 BA तो कर ही लिए होंगे.
RBI के लिए बैंकिंग, फाइनेंस, इंश्योरंस, और पैसो के बारे में पढ़ा. सभी RBI रिपोर्ट्स को गहराई से पढ़ा.
3 साल के बाद में एक जोकर, बेवकूफ लड़के से एक मैच्योर, समझदार आदमी बन गया था. जब दोस्तों से मिलता, वो शॉक हो जाते कि कोई इतना कैसे बदल सकता है. किसी भी टॉपिक पर कितनी भी देर बात कर सकता था. डिबेट करता, चीजों पर अपनी राय रखता. जब बात करता, मैं स्मार्ट लगता. अब वो मेरी जेन्युइन *रेस्पेक्ट* करते थे.
मुझे और क्या चाहिए था?
इतने सारे एक्साम्स को शुक्रिया, कि मैंने एक एग्जाम पास कर लिया. होम मिनिस्ट्री में अब मेरी एक अच्छी नौकरी है.
इस सफ़र के अंत में, मेरे पास एक 60 हजार रुपए प्रति महीने की नौकरी है.
इस सफ़र के अंत में, मुझे मेरा प्यार मिल गया है, जिसने मेरे सबसे बुरे समय में मेरा साथ दिया.
इस सफ़र के अंत में, मुझे इज्जत मिली है. दोस्तों, मम्मी-पापा, परिवार, रिश्तेदार, और कोरा पर.
इस सफ़र के अंत में, मैं ज्यादा समझदार, ज्ञानी और जानकार हूं.
इस सफ़र के अंत में, मैंने सीख लिया है कि जिंदगी अच्छी या बुरी नहीं, बस जिंदगी है.
जब-जब मैं कोई एग्जाम पास नहीं कर पाया, मुझे लगता था मैं गिर गया हूं. दुख और डिप्रेशन से घिर जाता था. कुंठित हो गया था. फिर से फेल हुआ. फिर बार-बार फेल हुआ. और ये समझ गया कि गिरना कुछ नहीं होता.
जो चीजें मेरे वश में नहीं है, उन पर फ्रस्ट्रेट होने का कोई तुक नहीं है. किस्मत को कोसने का कोई फायदा नहीं है. मैंने सीखा है कि जो मैं हूं, मुझे उसके बारे में खुश रहना चाहिए. और ये समझने के बाद मैं सुकून में हूं, पहले से कहीं बेहतर कर रहा हूं.
क्या मैं इन सब एग्जाम्स में फेल हुआ हूं? हां.
क्या मैं जिंदगी में फेल हुआ हूं? नहीं, बिलकुल नहीं.
मैं अपने जीवन से प्यार करता हूं. सफल नहीं हुआ तो क्या, मैं खुश हूं.
मेरे पास वो सब नहीं, जो मैं चाहता था. पर वो सब है, जिसकी मुझे जरूरत थी.
और मुझे क्या चाहिए?
तो हां, ये एक खुशनुमा सफ़र था. एक अच्छा अनुभव! लेकिन क्या ये अंत है? नहीं, मैंने अभी बस शुरुआत की है।

साभार : GS Power
 
 

असफलताओं को पीछे छोड़ पीसीएस अधिकार बने अरविंद

जीवन के लिए लक्ष्य तय किया, उसमें आने वाले बाधाओं को पार कर एक युवक जो इंटरमीडिएट की परीक्षा में फेल हुआ, वह आज उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपी-पीसीएस लोअर) की परीक्षा पास कर श्रम प्रवर्तन अधिकारी बन गया है।
जी हां, सिर्फ मंजिल पर नजर रखने वाले ही ऐसा कर दिखाते हैं। हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के पौड़ी जिले के नैनीडाडा ब्लॉक की ग्राम पंचायत बड़ेथ निवासी अरविंद सिंह नेगी की। अरविंद सिंह ने वर्ष 2003 में हाईस्कूल की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास की। वर्ष 2005 में इंटरमीडिएट की परीक्षा दी, किंतु असफल रहे। इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और फिर से इंटरमीडिएट की परीक्षा दी और प्रथम श्रेणी प्राप्त की।
पिता मेरठ में चाय की दुकान लगाते हैं। उन्होंने चाय की दुकान पर काम करते हुए ही बीकॉम व एमकॉम की डिग्री भी हासिल की। व्यापारियों के बहीखाते भी संभाले। साथ ही पिता का भी हाथ बंटाते रहे। वर्ष 2013 में पहली बार पीसीएस की परीक्षा दी, लेकिन चूक गए। वर्ष 2015 में उन्होंने फिर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपी-पीसीएस लोअर) की परीक्षा दी। इस परीक्षा का परिणाम हाल ही में घोषित हुआ। इसमें अरविंद का चयन श्रम प्रवर्तन अधिकारी के पद पर हुआ है।
असफलाओं से ना घबराकर अपनी मंजिल पर निगाहें रखने वाले अरविंद को अब वर्ष 2016 में दी गई पीसीएस (अपर) परीक्षा के परिणामों का इंतजार है। जबकि, वर्ष 2017 पीसीएस का मेन एग्जाम देना भी बाकी है।
असफलाओं की चोटें सहते हुए भी अरविंद ने मंजिल की ओर कदम बढ़ाना नहीं रोका।


किसी ने विद्वान ने बिल्कुल ठीक कहा है-
मनुष्य का मन कछुए की भांति होना चाहिए, जो बाहर की चोटें सहते हुए भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता और धीरे-धीरे मंजिल पर पहुंच जाता है।

*6 मई, 2018 को समाचार पत्रों में प्रकाशित जानकारी पर आधारित

Sunday, November 29, 2020

सवाल- कितने घंटे पढूं... जवाब- छत्तीस घंटे पढ़ो

- अशोक सैन

किसी ने सवाल पूछा- कितने घंटे पढूं? मैंने कहा 'रोज छत्तीस घंटे पढ़ा करो। बाद में समय मिले तो थोड़ा आराम कर लिया करो।' उसने कहा 'ऐसे कैसे??' मैंने कहा 'अरे यार.. आप रोज चालीस घंटे पढ़ोगे तो थक न जाओगे?? हैं?? और सारा टाईम पढोगे तो पबजी कब खेलोगे.. एफबी पर लाइक भी तो ठोकना होता है... पिक पर वेरी नाइस ऐसा झूठ बोलने की मेहनत के लिए भी तो समय निकलना होता है... कोई सेहत का खयाल है कि नहीं??' उसने कहा 'ये क्या मजाक है'.. मैंने कहा 'मजाक तो आप खुद के भविष्य के साथ कर रहे हो.. एफबी पर पबजी वालों से पढ़ाई के समय की सलाह ले रहे हो... जैसे ढिंचक पूजा से शास्त्रीय संगीत की सलाह लेना... जैसे पाकिस्तान से आतंक कम करने की सलाह लेना'..क्या बताऊं??
      आप एफबी पर ये सवाल पूछ रहे हो जहाँ 99त्न से ज्यादा लोग बस टाईमपास करने आते है... अरे भाई आप खुद अपने पढऩे का समय तय नहीं कर सकते, मतलब आपकी निर्णय क्षमता कमजोर है.. एक आईएएस अफसर की निर्णय क्षमता अच्छा होना यूपीएससी के विचार में बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
आपने ना पाठ्यक्रम पढ़ा... ना उसकी सही किताबों की गहराई नापी... उस गहराई को समझने के लिए आपकी दिमागी ताकत आप खुद कैसे इस्तेमाल करोगे, ना ये जाना। कम से कम खुद को इतना तो पता होना ही चाहिए कि एक पन्ना पढ़कर समझने के लिए आपको कितना वक्त लगेगा? आपका दिमाग परीक्षा के युद्ध में आपका अहम हथियार है। आपके खुद के दिमाग को कितना वक्त लगेगा ये भी आपको नहीं पता, मतलब आप युद्ध लडऩे जा रहे हो और आपको आपके हथियार की ही जानकारी नहीं... ऐसे में कैसे जीतोगे युद्ध??
      हर इंसान की क्षमता अलग-अलग होती है... कोई किसी पाठ को 20 मिनट्स में समझ लेता है तो किसी को आधा घंटा लगता है... दूसरों के समय से कैसे तय कर सकते हो कि आपकी क्षमता क्या होगी..और वो भी एफबी की जनता से पूछकर जहाँ लोग सिलेबस से ज्यादा लड़की की फोटो पर लाइक ठोकने में उस्ताद है.. खुद के आईएएस के सपने का मजाक न बनाओ.... गंभीर बनो... गौतम गंभीर नहीं... सिलेबस को समझने में गंभीर... ताकि अपनी मेहनत को निखारने का सही रास्ता पा सको, जो सही भी हो और किफायती भी...।
      आमतौर पर शुरुआती सीधा गणित ये है कि 'जिस विषय में ज्यादा अंक उसको पढऩे के लिए ज्यादा समय'.. लेकिन ये अनुभव बताता है कि ये गणित हमेशा काम नहीं आता..क्योंकि सिलेबस में कुछ ऐसे मुद्दे भी है जिन्हें कम अंक हैं लेकिन पढऩा ज्यादा होता है और उन्हें अनदेखा भी नहीं कर सकते क्योंकि वो बहुत अहम भी होते हैं (वैसे तो सब अहम ही हैं????!!)। उसमें भी सही किताब कौन-सी होगी... उस किताब में जानकारी छोटी होगी या बड़ी और जैसी भी होगी उसको लेकर आपका दिमाग उसे पढ़कर समझने में कितना समय लेगा और उसकी नोट्स आप कैसे बना पाओगे ये सब समझना होता है... क्योंकि इतनी सारी जानकारी की बिना शॉर्ट नोट्स बनाए आप रिवीजन नहीं कर सकते... रिवीजन नहीं हुई तो याद नहीं रहेगा, याद नहीं रहेगा तो परीक्षा में लिख नहीं पाओगे... और लिख ही नहीं पाओगे तो यूपीएससी आपको देश में पहली रैंक प्रदान करेगा... है ना?? मतलब ये सब खुद सोचने-समझने की जरूरत होती है... जब आप इन सारी बातों को समझोगे तब आपको कोई बेवकूफ नहीं बना पाएगा... और ये जरूरी भी है... क्योंकि इंटरनेट पर आज इतनी जानकारी है कि कोई भी आपको फंसा सकता है... उनकी बकवास जानकारी आप आईएएस बनने के लिए अच्छी समझकर पढ़कर समय बिताते रहोगे लेकिन पास न हो पाओगे... क्योंकि आपने अपनी समझ ही विकसित नहीं की होगी... बस एफबी पर किसी से पूछ लिया और मान लिया... अरे भाई ज्यादातर यूट्यूबर्स को भी आपके पास होने में कोई दिलचस्पी नहीं होती... वो बस लाइक, शेयर, सब्सक्राइब से पैसा कमाना चाहते हैं... इसलिए वो भी घटिया/अपूर्ण जानकारी के आकर्षक विडिओज दिखाकर आपको भटका सकते हैं... आप भटकते रहोगे और गंभीर अभ्यर्थी लाईब्ररी में पढ़कर पास भी हो जाएंगे... फिर 2-4 बार फेल होने के बाद आपको अक्ल आएगी कि खुद की समझ विकसित करके ही आगे बढऩा सही था... न कि किसी फेसबुकिये से सलाह लेकर भविष्य तय करना...
आपकी खुद की सोच जितनी विकसित होगी उसी के आधार पर यूपीएससी आपका चयन करेगा... दूसरों की सलाह पर खुद की निर्णय क्षमता तय करने की अविकसित सोच के व्यक्ति को यूपीएससी आखिर आईएएस के अधिकार क्यों देना चाहेगी?

- अशोक सैन की फेसबुक वॉल से साभार

Thursday, September 24, 2020

जिस दिन मन हारने लगे उस दिन बस एक बात सोचना कि शुरू क्यों किया था...

-अरविन्द शर्मा

यह कहानी है एक जिद की....!
यह दास्तां है एक जुनून की...!
यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की।
यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया।


पिता एक दिहाड़ी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है। संघर्ष की, सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी ।

मैंने संघर्ष की ऐसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पड़ता था। झुग्गी में माहौल ऐसा होता था कि पढ़ाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी।
बाबा (पापा) दिहाड़ी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हम सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता, वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपड़ी की हालत ऐसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था ।

मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढ़ाने की हर संभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढ़ाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा । 

लेकिन इसका असर मेरी पढ़ाई पर पड़ा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढ़ाई छोडऩे की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं कि ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढ़ाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढ़ाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था । मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पड़ेगा ।

एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढऩे के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं। मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शनशास्त्र मेरे मुख्य विषय थे । 

विषय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेंद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड़ है। उनका पढ़ाने का तरीका ही कुछ ऐसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं । उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता। मैंने जिंदगी के हर मोड़ पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थितियों से हार स्वीकार नहीं की। 

जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और खुद भी पढ़ता रहा। इस दौरान न जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं । 

मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद ब खुद आ जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते। मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऐसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सब कुछ होम कर दिया।

मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं। मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, पर्क होता है तो सिर्फ इच्छा शक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा- निराशा कभी मुझ पर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं ...!
'मैं तूफानों में चलने का आदी हूं...!

-अरविन्द शर्मा की फेसबुक वॉल से साभार

Sunday, August 9, 2020

स्वर्ग-नरक सब अपने हाथ में ही है

एक बुजुर्ग महिला की मृत्यु हो गई, यमराज उसे लेने आये।
महिला ने यमराज से पूछा: आप मुझे स्वर्ग ले जाएँगे या नरक?
यमराज बोले: दोनों में से कहीं नहीं। तुमने इस जन्म में बहुत ही अच्छे कर्म किये हैं, इसलिये मैं तुम्हें सीधे प्रभु के धाम ले जा रहा हूं।
बुजुर्ग महिला खुश हो गई और बोली: धन्यवाद, पर मेरी आपसे एक विनती है। मैंने यहाँ धरती पर सबसे स्वर्ग-नरक के बारे में सुना बहुत सुना है, मैं एक बार इन दोनों जगहों को देखना चाहती हूं।
यमराज बोले: तुम्हारे कर्म अच्छे हैं, इसलिये मैं तुम्हारी यह इच्छा पूरी करता हूं। चलो हम स्वर्ग और नरक के रास्ते से होते हुए प्रभु के धाम चलेंगे।
दोनों चल पड़े। सबसे पहले नरक आया। नरक में बुजुर्ग महिला ने जोर-जोर से लोगों के रोने की आवाज सुनी। नरक में सभी लोग दुबले-पतले और बीमार दिखाई दे रहे थे।
महिला ने एक आदमी से पूछा: यहां आप सब लोगों की ऐसी हालत क्यों है?
आदमी बोला: तो और कैसी हालत होगी, मरने के बाद जबसे यहां आये हैं, हमने एक दिन भी खाना नहीं खाया। भूख से हमारी आत्माएँ तड़प रही हैं।
बुजुर्ग महिला की नजर एक विशाल पतीले पर पडी़, जो कि लोगों के कद से करीब 300 फुट ऊंचा होगा, उस पतीले के ऊपर एक विशाल चम्मच लटका हुआ था। उस पतीले में से बहुत ही शानदार खुशबू आ रही थी।
बुजुर्ग महिला ने उस आदमी से पूछा: इस पतीले में क्या है?
आदमी मायूस होकर बोला: ये पतिला बहुत ही स्वादिष्ट खीर से हर समय भरा रहता है।
बुजुर्ग महिला ने हैरानी से पूछा: इसमें खीर है? तो आप लोग पेट भरके ये खीर खाते क्यों नहीं, भूख से क्यों तड़प रहें हैं?
आदमी रो-रो कर बोलने लगा: कैसे खायें! ये पतीला 300 फीट ऊंचा है हममें से कोई भी उस पतीले तक नहीं पहुँच पाता।
बुजुर्ग महिला को उन पर तरस आ गया सोचने लगी बेचारे, खीर का पतिला होते हुए भी भूख से बेहाल हैं। शायद ईश्वर ने इन्हें ये ही दंड दिया होगा।
यमराज बुजुर्ग महिला से बोले: चलो हमें देर हो रही है।
दोनों चल पड़े, कुछ दूर चलने पर स्वर्ग आया। वहाँ पर बुजुर्ग महिला को सबकी हंसने, खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी।
सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। उनको खुश देखकर बुजुर्ग महिला भी बहुत खुश हो गई।
पर वहाँ स्वर्ग में भी बुजुर्ग महिला कि नजर वैसे ही 300 फुट ऊँचे पतीले पर पड़ी जैसा नरक में था, उसके ऊपर भी वैसा ही चम्मच लटका हुआ था।
बुजुर्ग महिला ने वहाँ लोगो से पूछा: इस पतिले में क्या है?
स्वर्ग के लोग बोले: इसमें बहुत स्वादिष्ट खीर है।
बुजुर्ग महिला हैरान हो गई! उनसे बोली: पर ये पतीला तो 300 फुट ऊँचा है। आप लोग तो इस तक पहुँच ही नहीं पाते होंगे। उस हिसाब से तो आप लोगों को खाना मिलता ही नहीं होगा, आप लोग भूख से बेहाल होंगे, पर मुझे तो आप सभी इतने खुश लग रहे हो, ऐसे कैसे?
लोग बोले: हम तो सभी लोग इस पतीले में से पेट भर के खीर खाते हैं
महिला बोली: पर कैसे? पतीला तो बहुत उँचा है।
लोग बोले: तो क्या हो गया पतिला उँचा है तो। यहां पर कितने सारे पेड़ हैं, ईश्वर ने ये पेड़-पौधे, नदी, झरने हम मनुष्यों के उपयोग के लिये तो बनाये हैं। हमने इन पेड़ों की लकड़ी ली, उसको काटा, फिर लकडिय़ों के टुकड़ों को जोड़ के विशाल सीढ़ी का निर्माण किया। उस लकड़ी की सीढ़ी के सहारे हम पतीले तक पहुँचते हैं और सब मिलकर खीर का आंनद लेते हैं।
बुजुर्ग महिला यमराज की तरफ देखने लगी! यमराज मुस्कुराते हुए बोले: ईश्वर ने स्वर्ग और नरक मनुष्यों के हाथों में ही सौंप रखा है, चाहें तो अपने लिये नरक बना लें, चाहें तो अपने लिये स्वर्ग। ईश्वर ने सबको एक समान हालातों में डाला है। उसके लिए उसके सभी बच्चें एक समान हैं, वो किसी से भेदभाव नहीं करते।
वहाँ नरक में भी पेड-पौधे सब थे, पर वो लोग खुद ही आलसी हैं, उन्हें खीर हाथ में चाहिए, वो कोई कर्म नहीं करना चाहते, कोई मेहनत नहीं करना चाहता, इसलिये सब भूख से बेहाल हैं।
यही तो ईश्वर की बनाई इस दुनिया का नियम है, जो कर्म करेगा, मेहनत करेगा, उसी को मीठा फल खाने को मिलेगा। अर्थात स्वर्ग एवं नरक आपके हाथ में ही हैं, मेहनत करें, अच्छे कर्म करें और अपने जीवन को स्वर्ग बनाएं।


साभार : व्हाट्सएप पर वायरल एक पोस्ट

Thursday, July 23, 2020

सिविल सेवा - बुरी मिसाल न बने जिन्दगी.....

किसी और की कहानी

-मोहित डागर

कुछ लोग हैं जो लम्बे समय से तैयारी में लगे हैं। सुखद परिणाम नहीं आ रहा। मन में आता है, क्या करें, छोड़ दें! कुछ और कर ले! क्या करें!
तो एक प्रसंग है, छोटा-सा भावुक सा....!!!!!

बहुत लम्बे संघर्ष के बाद एक मित्र का चयन आईएएस में हुआ था। और ऐसे समय हुआ था जब उन्हें लगने लगा था कि घर परिवार और उनके अब सारे संसाधन खत्म होने की कगार पर हैं। चयन होने के बाद बहुत सारे कोचिंग वाले बुलाते हैं, स्टूडेंट्स के साथ इंटरएक्सन के लिए। उन्हें भी एक ने बुलाया था।
स्टूडेंट्स में से एक ने सवाल पूछा, 'सर! आप इतने लम्बे समय से तैयारी कर रहे हैं और अभी तक टिके रहे अपनी तमाम असफलताओं के बावजूद, तो सर वो कौन सी बात है जो आपको इतना दिन के बाद भी प्रेरित करती रही।'

थोड़ा रुककर दिया लेकिन जवाब बहुत भावुक-सा था, "मैं एक खराब मिसाल नहीं बनना चाहता था। एक गांव से आया था तैयारी करने। मेरे गांव से कभी कोई आईएएस नहीं बना था.... और मेरे गाँव के साथ आसपास गाँव के लोग भी जानते थे कि मैं तैयारी करता हूँ। मैं सोचता था, गर नहीं बना और लौट गया तो लोगों पर क्या असर होगा। मेरा तो जो होगा सो होगा लेकिन आगे जब भी कोई बच्चा इलाहबाद से दिल्ली जाकर तैयारी करना चाहेगा, मना करने वाले मेरी मिसाल देंगे। नहीं हुआ लौट आया। तुम क्या जाओगे बहुत कठिन है। बीएड, बीटीसी कर लो, ये कर लो, वो कर लो तमाम बातें। तो मेरा जीवन एक बुरा उदहारण बन कर रह जायेगा। यह बात मुझे रोके रखती थी और मैं अपनी तमाम असफलताओं के बावजूद आगली बार सफल होने के लिए लगा रहता था.....!!!!!"

कहानी किसी और की है परंतु अगर....

-मोहित डागर की फेसबुक वॉल से साभार

Wednesday, April 3, 2019

आओ दोस्त! कर्मों का तूफान पैदा करें

ये आपका फैसला होगा कि आसमान की ऊंचाइयों से खूबसूरत दुनिया को देखते हो या असफलता की चौखट में ही रहकर सिमट जाते हो। क्या आप असफलता की चौखट पर ही अपना दम तोड़ देना चाहते हैं, क्या आप भूल गए कि आप घर से बाहर इसलिए निकले थे ताकि आप अपने सिर पर जीत का ताज पहन के घर पहुंचें, क्या आप भूल गए उनकी ख्वाहिशों को, अरमानों को जिन्होंने आपके लिए वर्षों से संजो कर रखे हैं, आखिर हुआ क्या है आपको, आखिर क्यों आप आज उस तरीके से नहीं लड़ रहे जिस तरीके से आप को लड़ना चाहिए! क्यों आप उन कसमों से दूर भाग रहे हैं जो आपको जीत दिलाती हैं आखिर क्यों आप एक नादान परिंदे की तरह गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए खामोश बैठे हैं, क्यों अभी तक आपके अंदर का मानव जगा नहीं! बहुत कुछ तो मैं नहीं कहना चाहता पर इतना जरूर बता दूं कि आप वह है जिसके अंदर से ही शख्सियत निकलती है, आप वह है जो कर्मो का तूफ़ान पैदा कर इतिहास बदल सकता है, आप वह है जो लकीर को इतनी लंबी खींच सकता है कि आगे आने वाले वर्षों तक वह सुनहरा बनकर चमकता रहेगा!

वक्त बहुत नहीं है पर वक्त इतना जरूर है कि आप अपनी जिंदगी को अपने जीवन को साकार कर जाइए! गौर कीजिए आपने आज तक क्या किया जब आप अपने घर से बाहर निकले थे तो आप की आंखों में कुछ ख्वाब थे, आपके होठों पर कुछ जज्बात थे, आपके चेहरे पर एक चमक थी और आपके कर्मों में एक तूफान था! आखिर क्यों आप थम सा गए हैं आपकी सिद्दत कहां गई? आपका जुनून कहां गया? ऐसा तो नहीं कि आप जिंदा लाश बन गए हैं! जनाब याद रखिए दुनिया उन्हीं को याद रखती है जो याद रखने जैसा कुछ कर जाते हैं! कल का तो मुझे पता नहीं पर आपसे इतना जरूर कहूंगा कि आप इस कदर मेहनत करो की खुद को सुकून मिले! इतिहास गवाह है... इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है जो संघर्षों से गुजरते हुए खुद को खुद के लिए खड़ा कर लेते हैं आपके अंदर – #दम है #ताकत है #शिद्दत है #जुनून है #जज्बा है #जज्बात है #ख्वाब है #ख्यालात है। याद रखिये आप इंसान हैं जो लड़ सकता है, गिर के उठ सकता है जो हार के भी जीत सकता है और जीत के भी जीत सकता है...
"हौंसले हो बुलंद तो हर मुश्किल को आसां बना देंगे,
छोटी टहनियों की क्या बिसात, हम बरगद को ही हिला देंगे !
वो और हैं जो बैठ जाते हैं थक कर मंजिल से पहले,
हम बुलंद हौंसलों के दम पर आसमां को ही झुका देंगे" !

हम कैसे हार मान सकते हैं अपनी मंजिल, अपने ख्वाबों से पहले, कैसे भाग सकते हैं अपनी जिम्मेदारियों से किसी के भी प्रति! बहुत लोगों की उम्मीद की किरण हैं हम, चाहे वो हमारे माता-पिता हो, चाहे हो भाई बहन, चाहे हो रिश्तेदार कोई, चाहे तो हमारा अपना समाज (Society), चाहे हो शहर अपना, हो चाहे हमारा अपना देश। तो दोस्तो पूरी ताकत से जुट जाइये और अब बस तभी रुकना हैं जब सफलता हमारे कदमों में हो ! ऐसी कोई चीज नहीं है, जो हम मेहनत, लगन व आत्मविश्वास से नहीं पा सकते. खुद पर भरोसा कर इंसान अपनी किस्मत खुद बना सकता है।

साभार : श्रवण झा के फेसबुक वाल से

Sunday, February 24, 2019

सपने सच होते हैं, बस आपको उन पर भरोसा होना चाहिए

सुरभि जीवंत उदाहरण हैं इस समाज के लिए, क्योंकि अगर भरोसा है, तो सपने सचमुच सच होते हैं।
गांव के टाट-पट्टी वाले हिंदी मीडियम स्कूल से निकलने वाली आईएएस ऑफिसर सुरभि गौतम की कहानी पढिय़े, जो पढ़ी थी कभी टाट-पट्टी वाले स्कूल में आज वो बैठती है आईएएस की कुर्सी पर...! प्ररेणादयक कहानी !

यूनिवर्सिटी टॉपर और गोल्ड मेडलिस्ट सतना (मप्र) की सुरभि गौतम को 2016 के सीविल सर्विसेज एग्ज़ाम में 50वीं रैंक हासिल हुई थी। इनकी 12वीं तक की पढ़ाई गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से हुई। सुरभि उन लोगों के लिए एक करारा जवाब हैं, जिन्हें या तो अपने हिंदी होने पर शर्म आती है या फिर जो हिंदी को बहुत गया गुजऱा समझते हैं, लेकिन सुरभि गर्व से कहती हैं कि उनकी पहली से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई हिंदी मीडियम स्कूल से हुई है।

आईएएस बनने का सपना सुरभि ने 10वीं क्लास से ही देखा शुरू कर दिया था। दसवीं में सुरभि को 93.4 प्रतिशत अंक मिले थे। सुरभि सतना के अमदरा गांव की रहने वाली हैं। पिता मैहर सिविल कोर्ट में वकील हैं और मां सुशीला गौतम शिक्षिका। 

आईएएस ऑफिसर सुरभि गौतम ने वो सब कर दिखाया जो अंग्रेजी से पढऩे वाले भी करते हैं। जिदगी में कुछ भी बेहतर करने के लिए कभी भाषा रुकावट नहीं बनती, वो तो हमारे समाज ने खुद को भाषाओं की बेडिय़ों में बांध रखा है। ये वहीं बेडिय़ां हैं, जो कभी-कभी देश को दो हिस्सों में बांटती हैं, एक हिस्सा अंग्रेजी और दूसरा हिस्सा हिंदी!
किसी ने सही ही कहा, पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं। ऐसा ही कुछ हाल सतना के अमदरा गांव की बेटी सुरभि गौतम का भी है। सुरभि के पिता मैहर सिविल कोर्ट में वकील हैं और मां डॉ. सुशीला गौतम अमदरा हायर सैकेंड्री स्कूल में शिक्षिका हैं। सुरभि बचपन से ही पढऩे में मेधावी रही हैं। हाईस्कूल में सुरभि को 93.4 प्रतिशत अंक मिले थे। यही वो नंबर थे, जिन्होंने सुरभि के सपनों और सफलता की नींव रखी। इन्हीं नंबरों के बाद से सुरभि ने कलेक्टर बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था। इनकी सफलता ने उन सभी एशो आरामों को खारिज किया है, जिनकी मदद से बड़े-बड़े पद हासिल किये जाते हैं।

सुरभि एक छोटे से गांव अमदरा की रहने वाली हैं। अमदरा से ही उन्होंने अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई की। 12वीं तक वो एक ऐसे स्कूल में पढ़ीं, जिस स्कूल में मूलभूत जरूरतों का गहरा अभाव था। वहां न तो अच्छे टीचर थे और न ही पढ़ाई लिखाई की अच्छी व्यवस्था। किताबें समय पर नहीं मिलती थीं। सुरभि के गांव में बिजली पानी की अच्छी व्यवस्था नहीं थी। बचपन के दिनों में सुरभि को लालटेन जला कर रात में पढ़ाई करनी पड़ती थी।

बारहवीं के बाद सुरभि ने स्टेट इंजीनियरिंग का एंट्रेंस एग्ज़ाम दिया। एंट्रेंस एग्ज़ाम में उनके काफी अच्छे नंबर आये, जिससे वो शहर के किसी भी सरकारी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए मान्य हो गईं। सुरभि ने भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यूनिकेशन्स में इंजीनियरिंग की। यहां भी उन्होंने टॉप करने की आदत नहीं छोड़ी और गोल्ड मेडल हासिल करने के साथ-साथ यूनिवर्सिटी टॉप कर ली।

कॉलेज के बाद सुरभि ने BARC (एक साल न्यूक्लियर साईंटिस्ट के तौर पर जुड़ी रहीं), GATE, ISRO (ऑल इंडिया दूसरा स्थान मिला), SAIL (इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर उन्हें कॉल भी आया), MPPSC PRE, SSC LGL, दिल्ली पुलिस और FCI की परीक्षाएं अच्छे नंबरों से पास कीं। 2013 के IES एग्ज़ाम में सुरभि को ऑल इंडिया फर्स्ट रैंक मिली और इन सबके बाद 2016 के IAS एग्ज़ाम में उन्हें ऑल इंडिया 50वीं रैंक मिली। सुरभि की प्रतिभा सचमुच बहुत दुर्लभ हैं। उन्होंने हर परीक्षा फर्स्ट अटैंप्ट में ही पास की है, वो भी अच्छे नंबरों से।

सुरभि बचपन से ही एक जिम्मेदार और महत्वकांक्षी लड़की रही हैं। वो हमेशा से कुछ करना चाहती थीं। उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा उनके पेरेंट्स रहे, जिन्होंने उनका हर परिस्थिति में मार्गदर्शन किया। सुरभि ने कभी किसी भी विषय के लिए ट्यूशन नहीं लिया। उन्होंने सेल्फ स्टडी से सबकुछ हासिल किया। न तो उन्हें सही समय पर किताबें मिलती थीं और न ही अच्छा स्कूल मिला, लेकिन उन्होंने वो कर दिखा, जो अच्छे-अच्छे स्कूलों में पढऩे वाले बच्चे भी नहीं कर पाते। सुरभि कहती हैं, "मेरा स्कूल और वहां का एजुकेशन सिस्टम काफी खराब था। स्कूल में कोई पढ़ाई नहीं होती थी, तो मेरी पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी मुझ पर और मेरे पेरेंट्स पर ही थी। मैं हमेशा सोचती थी, कि मुझे भी अच्छा स्कूल मिलता, काश मेरे स्कूल की भी एक बस होती, मैं भी यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल जाती, लेकिन उसके लिए मैं अफसोस नहीं करती, क्योंकि मेरे अभावों ने ही मुझे एंबिशियस बना दिया और मैं हर फील्ड में सबसे अच्छा करने की कोशिश करती थी।"

बचपन में सुरभि सिर्फ पढऩे वाली बच्ची ही नहीं थीं, बल्कि वो पेंटिंग भी बहुत अच्छी बनाती थीं और कविताएं भी लिखती थीं। स्केचिंग, रंगोली, कढ़ाई-बुनाई, ये सब भी सुरभि के शौक रहे हैं। 12वीं तक आते-आते सुरभि अपने गांव की सेलेब्रिटी बन चुकी थीं। लोगों को जितना अपने बच्चों के रिज़ल्ट का इंतज़ार नहीं रहता था, उतना सुरभि के रिज़ल्ट का इंतज़ार होता था। गांव का बच्चा-बच्चा उनके तेज़ दिमाग और स्कूल में हर साल टॉप करने की वजह से उन्हें बहुत अच्छे से जान गया था। लोग ये शुरू से ही मानते थे, कि ये लड़की कुछ बड़ा करेगी। इसके अभाव इसे रोक नहीं पायेंगे।

गांव की टॉपर सुरभि जब स्कूल के बाद कॉलेज में आईं तो उसके सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं। गांव और शहर दोनों जगहों के माहौल में एक बड़ा अंतर था। सुरभि को जो सबसे बड़ी समस्या फेस करनी पड़ी, वो थी इंग्लिश। सुरभि की इंग्लिश काफी कमज़ोर थी। उनके कॉलेज में अधिकतर बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूलों से थे और सुरभि हिंदी मीडियम से थीं। सुरभि के साथ वहीं सब हो रहा था, जो हिंदी मीडियम बच्चों के साथ होता है। लेकिन वो उन आम बच्चों जैसी तो थीं नहीं, कि उनके इंग्लिश हउव्वा जैसा हो। उन्होंने उस पर भी जीत हासिल कर ली। सुरभि कहती हैं, "मैं गांव में अपनी क्लास में पहली सीट पर बैठने वाली लड़की थी, लेकिन जब शहर में आई तो इंग्लिश न आने की वजह से सबसे पीछे बैठती थी। मुझे बहुत बुरा लगता था। मैं सोचती थी, मैं कहां आ गई। यहां तो मुझे कोई जानता ही नहीं। मेरे लिए ये सबकुछ बहुत अजीब था, जिसके चलते मैंने खूब मेहनत की। बाकि सबजेक्ट्स के साथ साथ इंग्लिश पर भी अपनी पकड़ बनाई और फस्र्ट सेमिस्टर में ही यूनिवर्सिटी टॉप कर ली और मुझे चांसलर अवॉर्ड मिल गया। इंग्लिश सुधारने के लिए मैंने बहुत ज्यादा मेहनत की। किताबों से स्पेलिंग ढूंढ-ढूंढ कर सीखती थी। रोज़ अंग्रेजी के नये 5-10 शब्द लिखकर दिवारों पर चिपका लेती थी और सुबह उठकर उन्हें देखती थी। सोते समय उन्हें देखती थी और उन शब्दों को उठाकर खुद से बातें करती थी। कोई भी नया अंग्रेज़ी का शब्द सुनने के बाद मन में बार बार रिवाईज़ करती थी। अपनी इन्हीं कोशिशों से मैंने धीरे-धीरे अपनी इंग्लिश सीखी और उसे ग्रामिटिकली इंप्रूव भी किया।"

अंग्रेजी के सीखने की ललक सुरभि के ज़ेहन में ऐसी सवार हुई, कि कॉलेज के दिनों से लेकर अब तक उनके सपने हिंदी में आने की बजाय अंग्रेजी में आते हैं। उनकी बातों पर जायें, तो उनके सपनों में लोग हिंदी में नहीं अंग्रेजी में बात करते हैं। कॉलेज के दिनों में सुरभि बाकी के बच्चों की तरह नहीं थी। वो न तो फिल्में देखने जाती थीं और न ही घूमने-फिरने में अपना वक़्त ज़ाया करती थीं। ये सबके करने के लिए उनके सामने पूरी एक उम्र पड़ी थी। पहले वो कुछ बन जाना चाहती थीं। वो जानती थीं, कि वो एक छोटे से गांव से आई हैं और इस तरह कुछ करने का मौका उन्हें अपनी मेहनत के बल पर मिला था। उस मौके को वो गंवाना नहीं चाहती थीं। सुरभि ने कॉलेज के दिनों दोस्तों के साथ समय गंवाने की बजाय अपनी पर्सनेलिटी, अपने बायोडेटा और माक्र्स इंप्रूवमेंट पर फोकस किया।

12वीं क्लास तक सुरभि को रिमेटिक फीवर की समस्या थी, जिसके चलते उनके पेरेंट्स उन्हें हर 15 दिन में गांव से 120 किमी दूर जबलपुर डॉक्टर के पास लेकर जाया करते थे। इस समस्या के दौरान सुरभि को शारीरिक तौर पर तेज़ दर्द का सामना करना पड़ता था। उनकी हड्डियां कमज़ोर हो चुकी थीं। हर पंद्रह दिन में उन्हें हाई डोज़ इंजेक्शन दिया जाता था। इस इंजेक्शन के लगने के बाद भी सुरभि 3-4 दिन तक बुखार में रहती थीं, लेकिन फिर भी इस बहादुर लड़की ने हार नहीं मानी। आज के बच्चों से सुरभि कहना चाहती हैं, कि "मैंने कॉलेज की पढ़ाई बहुत अच्छे से और काफी मेहनत से की थी। मैंने कभी कोई कोचिंग नहीं ली। अगर आपको आसानी से कोचिंग मिल रही है तो चले जाईये, वरना चीज़ों को स्टेक पर रखकर कोचिंग जाने की कोई ज़रूरत नहीं है। ग्रेजुएशन के टाईम पर ही ग्रेजुएशन के सब्जेक्ट्स बहुत अच्छे से पढ़ें। अगर कॉलेज अच्छा नहीं है, तो भी। क्योंकि मेरा कॉलेज भी कोई बहुत अच्छा कॉलेज नहीं थी। वो एक नॉर्मल इंजीनियरिंग कॉलेज था।"

कॉलेज के बाद सुरभि का पहला प्लेसमेंट TCS (टाटा कंसलटेन्सी) में हुआ था लेकिन उन्होंने उस नौकरी को जॉइन नहीं किया, क्योंकि उनकी दुनिया और सपने इससे भी बड़े थे। कॉलेज के बाद ही सुरभि ने BARC की परिक्षा दी और इंटरव्यू निकाल लिया। BARC का इंटरव्यू काफी मुश्किल होता है। इस इंटरव्यू को क्लियर करने के बाद सुरभि का कॉन्फिडेंस काफी बढ़ा। ट्रेनिंग के दौरान ही सुरभि ने आईएएस की तैयारी की। उन्होंने अपनी सिविल सर्विसिज़ की पूरी तैयारी सेल्फ स्टडीज़ से की। बिना किसी की मदद लिए, वो भी इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग जैसा मुश्किल सब्जेक्ट चुन कर। सुरभि अपना 25वां जन्मदिन मसूरी की LBSNAA (लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन) में मनाना चाहती थीं और उनकी चाहत साकार भी हो गई। वो कहती हैं, कि "सपने देखिये, सपने देखने के पैसे नहीं लगते और बड़े सपने देखिये। उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करिये। इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यदि मैं आगे बढ़ सकती हूं, इतने सारे एग्ज़ाम्स क्लियर कर सकती हूं, टॉप कर सकती हूं, तो आप क्यों नहीं? सपने सच होते हैं, बस आपको उन पर भरोसा होना चाहिए।"

बात चाहे अभावों की हो या किसी भी तरह के शारीरिक कष्ट की, अंग्रेजी न आने की हो या गांव में टाट-पट्टी वाले स्कूल में पढऩे की, दुनिया का कोई भी अभाव सुरभि को आईएएस बनने से नहीं रोक पाया। सुरभि जीवंत उदाहरण हैं इस समाज के लिए, क्योंकि अगर भरोसा है, तो सपने सचमुच सच होते हैं।

-आनंद चौधरी की फेसबुक वॉल से साभार

Friday, September 21, 2018

️कौन बनते हैं आईएएस और आईपीएस

यूपीएससी से IAS या IPS इंसान ही बनते हैं. कई सवाल जो हम अप्रेन्टिस को असमंजस में डालते आये है, कई नये अप्रेन्टिस दोस्तों ने ब्लॉग पर पूछा कि आईएएस बनने के लिए इंसान के अन्दर क्या होना चाहिए, क्या IAS सिर्फ अच्छे पढ़ने वाले, मेधावी विद्यार्थी ही बन सकते हैं जिनका पास्ट अकेडमिक रिकॉर्ड अच्छा रहा हो?
ऐसा बिल्कुल नहीं है. आप भी आईएएस बन सकते हैं. यह बिल्कुल मैटर नहीं करता कि आपने 10वीं या 12वीं में क्या स्कोर किया है….भले आपने ग्रेजुएशन थर्ड डिवीज़न से पास की हो….पास्ट पास्ट होता है. पास्ट को भूलकर आपको आगे देखना चाहिए. यदि आप पास्ट की गलतियों को देखकर अपने आज को ख़राब कर रहे हैं तो आपको अपने भविष्य में अन्धकार ही अन्धकार मिलेगा. इसलिए अच्छा है कि पीछे मुड़ कर कभी न देखें !


पढ़ाई के दौरान एकाग्रचित कैसे हों? 

क्या आपने अपने शहर में घोड़े को चलते देखा है? घोड़े के दोनों आँखों के बगल में चमड़े की पट्टी लगा दी जाती है. ऐसा इसीलिए क्योंकि वह सीधा देख पाए. चलते वक़्त उसके बगल में होने वाली सड़क की गतिविधियों पर उसका ध्यान न जा पाए और वह सिर्फ सीधा देख कर अपने लक्ष्य की ओर चले. ऐसा विद्यार्थी जीवन में भी होना चाहिए. आप अपने अगल-बगल की गतिविधियों पर ध्यान मत दें. कौन आपके बारे में क्या कह रहा है, आपके बारे में क्या विचार रखता है, आपके फूफा आपका मजाक उड़ाते हैं, आपके पड़ोसी आपके घर पर बैठने को लेकर तंज कसते हैं….यदि आपका ध्यान इन सब पर चला गया तो आप अपने लक्ष्य को पाने से चूक जायेंगे !
आप सफल हो जायेंगे तो यही लोग आपको बधाई भी देंगे. दूसरों को कहते फिरेंगे कि देखिए मेरा भतीजा/भाँजा आईएएस/आईपीएस है. अन्दर ही अन्दर वे भले ही कुढ़ते रहें पर शान से आपकी तारीफ़ दूसरों के सामने करेंगे ताकि उनका स्टेटस भी ऊँचा हो. इसीलिए इन मामूली फैक्टर से अपने जीवन को नष्ट मत कीजिए. लोगों को कहते रहने दीजिए, मैं भी आप ही लोगों में से यूँही एक तरह से इसी तरह सुनता आया हूँ बेफिक्र रहिये बेबाक रहिये हमारी तरह !


UPSC की परीक्षा कोई बैंकिंग या SSC की परीक्षा नहीं है. यह एक high-level परीक्षा है. इनके सवाल अच्छे-अच्छों की छुट्टी कर देते हैं. आपने लाख तैयारी की हो, 24 घंटे ही क्यों न पढ़ लिया हो, पर आप जनरल नॉलेज के 200 के 200 सवाल कभी सही नहीं कर सकते जैसा CAT या अन्य MBA परीक्षा में लोग कर लेते हैं. इसलिए आपकी मंजिल टेढ़ी-मेढ़ी है और न ही इसका कोई शोर्ट-कट है. हम अपनी मंजिल तभी पूरी कर पायेंगे जब हम स्वयं में यह दृढ़संकल्प करें कि हम किसी भी बाहरी नकारात्मक शक्तियों को अपने आस-पास भी नहीं फटकने देंगे और दिन -रात एक करके अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे !
आईएएस की तैयारी के लिए एक साल पर्याप्त माना जाता है. वैसे ये विद्यार्थी के क्षमता पर निर्भर करता है. किसी के लिए 6 महिने की पढ़ाई भी काफी है और किसी के लिए 2 साल की पढ़ाई भी काफी नहीं. पर इसमें निराश होने की जरुरत नहीं. क्षमता को बढ़ाया और घटाया जा सकता है. आप ठान लें कि आज से और अभी से आप अगले साल तक रोजाना 6 घंटे की पढ़ाई करेंगे तो आप इस टेढ़े-मेढ़े सफ़र को सरलता से पार कर जायेंगे. पर ऐसा अक्सर होता नहीं. हर लोगों का मोटिवेशन लेवल अलग-अलग होता है और यही मोटिवेशन लेवल हार और जीत का फैसला करता है. आप हो सकता है आज यह आर्टिकल पढ़ कर कसम खा लें कि मैं रोजाना आईएएस की पढ़ाई के लिए अगले मेंस तक 6 घंटे दूंगा….और यह भी हो सकता है कि आप आज और कल तक अपने संकल्प पर कायम भी रहें….मगर तीसरे दिन आते-आते तक …कुछ ऐसा होगा कि आप फिर वापस वहीं पर चले जायेंगे जहाँ पहले थे. सब छूट जायेगा. किसी की गर्लफ्रेंड नाराज़ हो जाएगी, कभी व्हाट्सएप गुनगुनाने लगेगा, कभी पिताजी की डांट पड़ने से उदास हो जाओगे….कुछ न कुछ ऐसा हो ही जायेगा कि आप अपने लक्ष्य से भटक जाओगे !


वहीं जिसका सफल होना लिखा है…वह अपने लक्ष्य पर डटा रहेगा. चाहे आँधी आए, चाहे तूफान….चाहे गर्लफ्रेंड ने बात करना बंद कर दिया, चाहे पापा की डांट ही क्यूँ न पड़ गयी हो..उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. वह दिन-रात एक कर देगा. इन्टरनेट पर भी वही चीजें देखेगा जो उसकी काम की हों, जो उसे प्रोत्साहित करती हों…जो उसके नोट्स बनाने के काम आए या फिर कुछ उपयोगी विषय-वस्तु लगे अवगत रहें !

मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं…!

मेरी भी नहीं, यही सवाल प्रारंभ में मेरा भी था, लेकिन सवाल को करने से मुझे आज तक कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि नुकसान ही हुआ है ! कईओं का यही सवाल... उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं हैं, लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे कैसे आगे बढ़ें? हाँ. हमारे नसीब में हर कुछ नहीं होता. किसी के पास किताबें खरीदने के पैसे-ही-पैसे हैं….हज़ारों की किताबें वह खरीद सकता है मगर दुर्भाग्य है कि उन्हें पढ़ने का उसके पास समय ही नहीं. किन्हीं को एक किताब को खरीदने के लिए 100 बार सोचना पड़ता है. पुरानी किताबों को बेचकर उन्हें नयी किताबें लेनी पड़ती हैं. पर सोचिए, आपके पास सिर्फ पैसे नहीं हैं, किन्हीं-किन्हीं के पास लिखने के लिए हाथ भी नहीं है, किन्हीं की आँखें कमजोर हैं, उन्हें कुछ दिखता नहीं….!
इसलिए पीड़ा की कोई सीमा नहीं है. आप गरीब हैं, अमीर हैं…फर्क तो पड़ता है. पर उतना नहीं जितना हम सोच लेते हैं. किताबें उधार भी ली जा सकती हैं, पुरानी किताबों को भी कम दामों में ख़रीदा जा सकता है….बस दिमाग में यह रहना चाहिए कि हमें रुकना नहीं है, चलते रहना है…चलते रहना है….जितना कठिन संघर्ष होगा उतनी ही शानदार जीत होगी. अपनी सोच को संकुचित नहीं कीजिए. मेरे पास ये नहीं है, वो नहीं है से अच्छा है कि जो है उसका पूर्ण प्रयोग करना सीखें. छोटी सोच और पैर में पड़ी मोच से आगे कभी नहीं बढ़ा जा सकता !


क्या दिल्ली जाना जरुरी है? सबसे बड़ा सवाल !

यूपीएससी परीक्षा में सफल होने के लिए दिल्ली जाने की आवश्यकता नहीं है. आप बेशक घर बैठे भी तैयारी कर सकते हैं. घर में बैठने से बहुत बार मन टूटता है. कभी चीनी ले आओ, कभी सब्जियाँ …पढ़ाई के बीच-बीच में आपको कई बार उठना पड़ता है. आप अन्दर से चिढ़ जाते हैं और यही चिढ़ आपमें नकारात्मकता लाता है जो आपके लक्ष्य के लिए खतरनाक है. घर के कुछ काम कर देने से आपका बहुत सारा समय बर्बाद नहीं होता, हद से हद 2 घंटे, वह भी रोज नहीं…कभी-कभी. मगर इसको लेकर स्वयं को स्ट्रेस मत दें…पॉजिटिव सोचें….आपको इस परीक्षा के लिए समाज के बारे में भी जानना है. याद कीजिए UPSC आपसे decision making से भी सवाल पूछती है. जैसे कि आप किसी दवाई की दुकान गए, आप गौर करते हैं कि दवाई वाले भैया ने आपको दवाई की खरीद पर रसीद नहीं दिया, कच्चा चिट्ठा दे कर पैसे ले लिए…तो ऐसे में आप क्या करेंगे? i) उसे इस बात से अवगत करायेंगे कि आपको रसीद देनी चाहिए और रसीद देने की माँग करेंगे ii) बगल के थाने में रिपोर्ट कर देंगे iii) उसे डरायेंगे-धमकाएंगे iv) चुप-चाप दवा ले कर घर लौट जायेंगे !
इसलिए जब तक आप समाज को जानोगे नहीं, बाहर घूमोगे नहीं…तो इन सवालों का जवाब आप दोगे कैसे? इसलिए हर चीजों को पॉजिटिव वे में लें….आपको कोई डिस्टर्ब भी कर रहा है तो उसमें भी कोई पोसिटिवनेस  ढूँढिए. दिल्ली जाना तभी ठीक है, जब आपके पास पर्याप्त पैसे हों या आप घर में बैठ कर बिल्कुल पढ़ नहीं सकते या आपके अगल-बगल परिवार में कोई भी इस बैकग्राउंड  से न हो !


मैं नया अप्रेन्टिस हूँ, शुरुआत कहाँ से करे ?.. 

बेहतर है पहले सिलेबस को ध्यान से देखिए. फिर पिछले साल आये सवालों को देखिए. उन पर रिसर्च कीजिए. यह भी एक अभ्यास है. धीरे-धीरे आप UPSC में पूछे जाने वाले सवालों के पैटर्न को अच्छी तरह समझने लगेंगे. आपको पता लग जायेगा कि UPSC डायरेक्ट सवाल नहीं पूछती ….जैसे- वर्तमान वित्त मंत्री कौन हैं, यह सब SSC लेवल के सवाल हैं. UPSC को पूछना होगा तो वह वित्त मंत्री के कार्यक्षेत्र क्या-क्या हैं…यह पूछेगी. इस तरह आप पैटर्न को समझेंगे. पैटर्न को जब आप समझ जायेंगे और फिर जा कर किताबों को पढ़ेगें तो आप पायेंगे कि आप किताब को अलग ढंग से पढ़ रहे हैं. आपको सिर्फ वही चीज उस किताब में दिखेगी जो आपके काम की हो. किताबों में वाक्यों पर पेंसिल से लाइन भी ड्रा करिए जो वाक्य आपको इम्पोर्टेन्ट लगे.

UPSC में लेखन अभ्यास का क्या रोल है?

आपको पढ़ने के साथ-साथ लिखने का भी अभ्यास करते रहना चाहिए क्योंकि लेखन के क्षेत्र में जब तक आपका हाथ नहीं खुलेगा आप मेंस में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाओगे. किसी भी टॉपिक को संक्षेप में (लगभग 200 शब्द) लिखने का रोज अभ्यास करें. यदि आपकी लेखन शैली को कोई जाँच करने वाला या व्याकरण चेक करने वाला हो तो सोने पर सुहागा है !


मैं लगातार मिल रही विफलता से टूट चुका हूँ

विफलता मिलने से टूटना स्वभाविक है. विफलता परेशान ही करती है और अन्दर से विचलित भी. पर अब तो आपके पास attempts भी कई सारे हैं. जरुरी नहीं कि हर कोई पहली या दूसरी बार में ही सफलता प्राप्त कर ले क्योंकि हमारे जीवन में भाग्य का भी रोल होता है. आपने कई बार देखा होगा कि आपका दिन कभी-कभी जरुरत से ज्यादा अच्छा जाता है और जिस दिन कुछ खराब होना रहता है तो उस दिन सब कुछ लगातार खराब ही ख़राब होता है. हिम्मत मत हारिये. कभी-कभी गुच्छे की आखरी चाभी भी ताला खोल देती है इसलिए डटे रहिए !

हर यूपीएससी अप्रेन्टिस के लिए यह काफी मोटीवेशन पोस्ट है सो बेहतर है आप इस पोस्ट को अधिक से अधिक "शेयर" ताकि अन्य भी इन शब्दों से रूबरू हो सके ! 
धन्यवाद !

साभार : एडी  चौधरी की फेसबुक वॉल से ज्यों का त्यों

Friday, August 24, 2018

कम संसाधन हो तो भी सफलता कैसे पाएं? सीखीए विजय गुर्जर से

  • ये स्टोरी है राजस्थान के झुंझुनूं जिले के एक किसान परिवार में जन्मे विजय गुर्जर की। उन्होंने 10वीं में मात्र 55 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। 12वीं में अंकों प्रतिशत 67 तक पहुंचा।
  • नौकरी की तलाश करते-करते उन्होंने कारोबार करने की भी सोची, लेकिन व्यवसाय के लिए आवश्यक पूंजी की कमी के चलते यह विचार त्याग दिया।
  • पिता लक्ष्मण सिंह के प्रोत्साहन पर नौकरी की तलाश शुरू की, जो जून 2010 में दिल्ली में कांस्टेबल के पद पर तैनाती के साथ खत्म हुई।
  • लेकिन विजय ने अपना विजय रथ यहीं नहीं रोका। नौकरी करते हुए दिसंबर 2010 में ही दिल्ली में दारोगा बने।
  • इसके बाद उन्होंने एसएससी की तैयारी की और सेंट्रल एक्साइज में चुने गए। लेकिन तैनाती केरल के त्रिवेंद्रम में मिलने के कारण उन्होंने फिर से एसएससी की परीक्षा दी और इस बार इनकम टैक्स विभाग में चयन हुआ। दिल्ली में तैनाती मिली तो सिविल सेवा की तैयारी करते रहे।
  • विजय ने सन् 2016 में तीसरी बार सिविल सेवा की परीक्षा दी। संस्कृत जैसा कठिन विषय उन्होंने चुना। लेकिन साक्षात्कार में महज 8 अंकों से चूक गए।
  • हार न मानते हुए जीवटता के धनी विजय ने प्रयास करना नहीं छोड़ा। नौकरी की, साथ ही 10 घंटे पढ़ाई भी की।
  • पांचवें प्रयास में वर्ष 2018 में विजय का चयन भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में हुआ है।
  • मेहनत के बल पर सफलता का स्वाद चखने वाले विजय का मानना है कि अभाव व कम संसाधन कभी विजय रथ को रोक नहीं सकते। यह जरूर है कि अभाव के कारण सफलता पाने में समय लग जाता है।
  • मेहनत के साथ ही समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानते हुए विजय एक ट्रस्ट चलाते हैं, जो गरीब व अभावग्रस्त बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मदद करता है।

*13 अगस्त, 2018 को समाचार पत्रों में प्रकाशित जानकारी पर आधारित

जीवन एक संघर्ष

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